हडप्‍पा सभ्‍यता

हडप्‍पा सभ्‍यता को सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता के नाम से भी जाना जाता है। यह कांस्‍य युगीन सभ्‍यता (Bronze Age culture)थी।

1921ई.में सर जान मार्शल के संरक्षण (Guidance)मे वर्तमान पाकिस्‍तान स्थित हडप्‍पा और मोहनजोदडो का उत्‍खनन कार्य (Excavation)क्रमश: श्री राय बहादुर दयाराम साहनी और राखलदास बनर्जी द्वारा किया गया। इस सभ्‍यता के लिए 3 नामों का प्रयोग किया जाता है।

1-सिन्‍धु सभ्‍यता 2- हडप्‍पा सभ्‍यता (यह आधुनिक नाम है।) 3- सिधु घाटी की सभ्‍यता (यह नाम डा.ह्वीलर ने दिया)

1- क्षेत्रफल-1299600 वर्ग किमी.(त्रिभुजाकार मे विस्‍तृत)।

2- पूर्व से पश्चिम तक की लंबार्इ- 1600 कि.मी.।

3- उत्‍तर से दक्षिण तक की लंबाई- 1100 कि.मी.।

4- समुन्‍द्र तट की लम्‍बार्इ- 1300 कि.मी.।

सभ्‍यता का क्षेत्रीय विस्‍तार -

1- सिंध क्षेत्र – मोहनजोदडो, आमरी, कोटदीजी, चन्‍हूदडो, अलीमुराद।

2- बलूचिस्‍तान- मेहरगढ, कीली गुल मुहम्‍मद, राणा घुण्‍डई, डाबरकोट, बालाकोट ।

3- अफगानिस्‍तान- मुंडीगक।

4- पश्चिम पंजाब- हडप्‍पा ।

5- गुजरात- धौलावीरा, लोथल, सुरकोटदा, भगतराव, रंगपुर, रोजदी, देसलपुर, प्रभाशपट्टनम ।

6- राजस्‍थान- कालीबंगा, मिथल।

7- उत्‍तर प्रदेश- आलमगीरपुर, मानपुर, हुलास।

8- हरियाणा- बनावली, राखीगढी।

9- पंजाब- रोपड

 

सभ्‍यता का उद्गम और विकास (Origin and Evolution of the Culture)

1- प्रथम चरण (पूर्व हडप्‍पा) - मेहरगढ- यह जगह बोलन दर्रे की तराई मे स्थित है और मोहनजोदडो के करीब 150मील उत्‍तर-पश्चिम मे है। यहां पर पशुचारियों शुरु होता है और भारतीय उपमहाद्वीम मे स्‍थार्इ कृषि के लिए अभी तक उपलब्‍ध प्राचीनतम प्रमाण उपलब्‍ध होते है । यहां पर आरंभिक अधिवासों के विभिन्‍न संस्‍तरो वाले छ: टीले है।

2- द्वितीय चरण (आरंभिक हडप्‍पा) आमरी –आमरी और निचली सिन्‍धु घाटी के सदृश स्‍थलो (जैसे कोटदीजी) मे सिन्‍धु सभ्‍यता के अस्तित्‍व मिले है।

सिन्‍धु सभ्‍यता के चारो चरण आमरी मे स्‍पष्‍ट रुप से परिलक्षित होते है। उत्‍तर हडप्‍पा मे अपनी क्षेत्रीय भिन्‍नता के कारण इसे ’झंगर संस्‍कृति के नाम से भी जाना जाता है ।

3- तृतीय चरण (परिपक्‍व हडप्‍पा ) कालीबंगन से पूर्व हडप्‍पा से लेकर परिपक्‍व हडप्‍पा के चिन्‍ह मिले है ।

4- चतुर्थ चरण –(उत्‍तर हडप्‍पा) लोथर इस का प्रमुख उदाहरण है। इसमे सिन्‍धु सभ्‍यता के नगरो के सभी प्रारुपी लक्षण मौजूद है।

सिन्‍धु सभ्‍यता का कालक्रम :-

  1- सर जॉन मार्शल के अनुसार -3250 B.C.से लेकर 2750B.C.

  2- ह्वीलर महोदय के अनुसार – 2500B.C. से लेकर1500 B.C.

  3- रेडियो कार्बन पद्यति, हडप्‍पा – सभ्‍यता का कालक्रम ई.पू. 2350 से 1750ई.पू्. के बीच निर्धारित करती है।

  4- N.C.E.R.T. हडप्‍पा सभ्‍यता का कालक्रम ई.पू. 2600से 1900ई.पू. के बीच निर्धारित करती है।

 

नगर क्षेत्र एवं खोजकर्ता

केन्‍द्र  वर्ष  खोजकर्ता का नाम  नदी 
हडप्‍पा  1921 दयाराम साहनी  रावी
मोहनजोदडो  1922 आर.डी. बनर्जी  सिंधु नदी 
आमरी  1929 एम.जी.मजुमदार --
चन्‍हुदडो 1931 एम.जी.मजुमदार  --
कोटदीजी 1955 एफ.ए.खान  सिन्‍धु 
सुतकोटदा 1964 जे.पी. जोशी --
रोपड 1953 वाई.डी. शर्मा सतलज
कालीबंगा 1951 अमलानंनद घोस घग्‍घर
वनावली 1973-74 आर.एस.विष्‍ट भोगवा
धौलावीरा 1967-68

जे.पी.जोशी(विष्‍ट के नेतृत्‍व में

धौलावीरा का उत्‍खनन जारी है। 

 
लोथल  1957 एस.आर.राव  

 

 

 

सबसे बडा हडप्‍पा स्‍थल (क्रमश:)-

1.मोहनजोदडो 2. राखीगढी-

भारत मे सबसे बडा ह‍डप्‍पा स्‍थल-

1.धौलावीरा 2.राखीगढी

हडप्‍पा सभ्‍यता की राजधानियां -

1.मोहनजोदडो 2. हडप्‍पा

पूर्व हडप्‍पा स्‍थल -

कालीबंगा, वणावली, आहड, नाल, कुल्‍ली, बालाकोट, कोटदीजी, गोमल, मेहरगढ, राना घुंडई।

उत्‍तर हडप्‍पा स्‍थल-

रंगपुर, रोजदी, प्रभाशपट्टन, आहर(उदयपुर), गिलुन्‍द, मितेथल, संघोल, रोपड, लालकिला(बुलंदशहर) ।

नगर निर्माण योजना (Town Planning)

नगर विन्‍यास के दो भाग:-

1- गढी(उचाई पर) पश्चिम की तरफ ।

2- निचला शहर पूर्व की तरफ।

गढी:- सामान्‍यत: किलेबंद, आयताकार व समानान्‍तर खंडो मे जबकि निचला शहर किलाबंद नही था लेकिन अपवाद स्‍वरुप लोथल, कालीबंगन व सुतकोटडा में किलेबंदी पाई गई है।

3- दीवार पर कुछ-कुछ दूरी पर बने बुर्ज सामान्‍यत: रक्षा दीवार से उचे होते थे लेकिन अपवाद स्‍वरुप वाणिज्यिक राजधानी होने के बावजूद लोथल मे कोई बुर्ज नही पाया गया है ।

सामान्‍यत: रक्षा दीवार और बुर्ज कच्‍ची मिट्टी (Raw earth) के बने होते थे (अपवाद -सुरकोटदा पत्‍थर की दीवार , मोहनजोदडो पक्‍की ईटों के बुर्ज)

सडके एवं गलियां:-

  1. समकोण (Right angle)पर काटती सडकें ।
  2. सडके कच्‍ची मिट्टी से निर्मित है।
  3. मुख्‍य सडक 10.5 मीटर चौडी है।

भवनो मे कच्‍ची ईट (Raw Brick), पक्‍की ईट (Baked brick), अलंकृत ईट (Decorated brick)झावा ईट (Square brick) एवं ‘L’ आकार की ईटो का प्रयोग हुआ है । ईटो का अनुपात 1:2:4 है। ईटो की जुडाई मे गारा, जिप्‍सम (नालियों मे ), बिटुमिन (मोहनजोदडो स्‍नानागार मे ) और चुना मिट्टी के प्रयोग के साक्ष्‍य मिलें है ।

भवनो के दरवाजे सहायक सडको(Accessory roads) पर खुले थे। कमरे का दरवाजा साइड मे रहता था खिडकी का साक्ष्‍य मोहनजोदडो मे मिला है। लोथल मे दरवाजे मुख्‍य सडको पर खुलते थे। सीढिया सामान्‍यत: प्रत्‍येक बडे घरो मे मौजूद थी । हडप्‍पा की अपेक्षा मोहनजोदडो मे सामान्‍य: सीढियां मिली है। छते मिट्टी एवं सरकडो से निर्मीत थी।

जल निकासी

1-जल निकासी व्‍यवस्‍था के अंतर्गत नालियां, नालो से होती हुई राजपथ के समानांतर मेनहाल द्वारा नदियों में जाकर मिलती थी । नलियों के निर्माण मे पक्‍की ईटो का प्रयोग हुआ हैं। कही-कही नाले ढके हुए (Coverd) पायें गयें।

2- कुऐं सामान्‍यत: वृत्‍ताकार एवं अंडाकार पाये गये हैं। प्राय: सभी घरो मे कुऐं होते थे।

  • प्रकाश स्‍तम्‍भ मोहनजोएडो की गलियों और सडको के किनारे पाये गये है।
  • सामाजिक स्थिति (Social Status)
 
  1. मातृप्रधान समाज
  2. संभवत: वर्ग विभाजित (Class division) समाज
  3. सामान्‍य श्रमिक वर्ग- सामान्‍य लोग।
  4. उच्‍च वर्ग शासक – पुरोहित व्यवसायी, अधिकारी
  5. सभ्‍यता के केन्‍द्रो में- व्यवसायी वर्ग
  6. तकनीकी तौर पर वैदिक लोगो से उन्‍नत

कृषि (Agriculture) –

इस सभ्‍यता की मुख्‍य फसले गेहू और जौ थी। चावल के उत्‍पादन का प्रमाण केवल लोथल और रंगपुर से प्राप्‍त हुआ था ।इसके अतिरिक्‍त खजूर, सरसो, तिल, मटर, बाजरा, नारियल, तरबुज, अनाज, नीबु, के भी साक्ष्‍य मिले हैं लेकिन रागी और गन्‍ना का कोई साक्ष्‍य नही मिला हैं।

पशुपालन(Animal Husbandary)-

1.बैल गाय भैस बकरी सुअर कुत्‍ता बिल्‍ली गधा ऊंट हाथी बाघ इत्‍यादि जानवरो का अस्तित्‍व था।

  1. कुबड वाले बैल के साक्ष्‍य रानीघुडई के द्वितीय चरण के खनन से प्राप्‍त होते है ।
  2. भेड (Sheep) और बकरी पालतू पशु थे । लेकिन लोग ऊंन निकालने से अपरिचित थे।
  3. भारतीय गेंडा (Rhin ceros) का एकमात्र प्रमाण आमरी से मिलता है ।
  4. 5. ऊंट की हड्डियां कालीबंगा से मिली है।
  5. शेर का कोई प्रमाण नहीं मिला है ।
  6. गाय की अस्थियों का कोई साक्ष्‍य नही मिला है ।
  7. घोडे का साक्ष्‍य मोहनजोदडो, लोथल एवं सुरकोतदा से प्राप्‍त हुआ हैं।

उद्योग एवं औद्योगिक केन्‍द्र (Industry and Industrial Centre)

  1. मनका उद्योग (Beads) –लोथल एवं चन्‍हुदडो ।
  2. 2. चुडी (Bangle) उद्योग – चन्‍हूदडो और कालीबंगन ।
  3. हाथीदांत- गुजरात ।

4.शंख-बालाकोट, लोथल रंगपुर कोटदीजी ।

  1. प्रस्‍तर (Stone) उद्योग- अमरी राखीगढी सुत्‍कांगेडोर ।

खनिज स्रोत (Mineral Source)

  1. चादी- अफगानिस्‍तान, ईरान,ख्‍ बलूचिस्‍तान, अरब।
  1. सोना (हवसक) – दक्‍कन (कोलार खान) अफगानिस्‍तान, फ्रांस आयात।
  • तांबा- खेतडी, ओमान
  • सीसा (Lead) -ईरान अफगानिस्‍तान ।
  1. टन (Tin) अफगानिस्‍तान, हजारीबाग !

मूर्ति निर्माण कला (Art of Figurines)-

हडप्‍पा से दो पाषाण मूर्ति मिली है – 1. नृत्‍य मुद्रा मे बनी बिना सिर की मूर्ति ,(मार्शल ने इसे नटराज का पूर्व रुप माना है ) 2. यांगासन की मुद्रा में बैठे पुरुष का घड

मोहनजोदडो -1. सेलखडी की खंडित मानव की मूर्ति 2. चूने पत्‍थर का बना सिर, पुरुष द्वारा बाल बढाने तथा मूंछ मुंडाने का साक्ष्‍य । स्‍त्री मूर्ति पुरुषो की अपेक्षा अधिक थी ।

नाप तोल की इकाई 16 के अनुपात मे थी । मोहनजोदडो से सांप और लोथल से हाथी दांत का पैमाना मिला है ।

मुद्राऐ सर्वाधिक सेलखडी से (2000 से अधिक संख्‍या में ) प्राप्‍त हुई है । इनपर हाथी कुबड बाला बैल बाघ एकश्रृंगी पशु गेंडा एवं भैसा की आकृति मिली है । आमतौर पर मुहरे चौकोर होती थी । बेलनाकार, वृत्‍ताकार, आयताकार मोहरें मिली है । लोथल एवं दशलपुर से ताबें  की मुहर मिली है। मुद्राओ का प्रयोग पहचान चिन्‍ह के रुप मे होता था न‍ कि विनीमय मे, क्‍योकि उस समय वस्‍तू विनिमय था। मोहनजोदडो से सर्वाधिक संख्‍या मे मुहर प्राप्‍त्‍ हुई है । मुहरो पर स्‍वास्तिक का निशान पाया गया हैं। कालीबंगा का मुद्रा पर बाघ का चित्रण (एक मात्र साक्ष्‍य ) पाया गया है ।

 

व्यापार वस्‍तू विनीमय (Exchange of Article or Barter System) द्वारा होता था ।देशीय व्यापार बैलगाडी एवं नावो द्वारा होता था जबकि विदेशी व्यापार मुख्‍यत: बन्‍दरगाहो ( लोथल, बालाकोट, सुत्‍कागेडोर) द्वारा होता था सुमेरिया से घनिष्‍ठ व्यापारिक सम्‍बन्‍ध थें। मेलुहा का सम्‍बन्‍ध मोहनजोदडो से किया गया, दिलमुन का सम्‍बन्‍ध मकरान तट से किया गया है ।

मोहनजोदडो से पुजारी का सिर, कांसे की नर्त की विशाल स्‍नानागार और अन्‍नागार (अन्‍न का गोदाम) मिले है ।

धार्मिक मान्‍यताऐं (Religious Beliefs)

देव मंदिर का कोई साक्ष्‍य नही । हालांकि ह्वीलर ने मोहनजोदडो के एक भवन को देवालय माना है पर यह विवादित (Controversial) हैं।

मातृदेवी (mother Goddess) की पूजा- उत्‍खनन से नारी से संबधित अनेक मूतिर्यो की प्राप्ति हुई है जिनसे स्‍पष्‍ट होता है कि सभ्‍यता में मातृदेवी की पूजा प्रमुखतम देवी तथा प्रजनन शक्ति (Reproduction Power) के रुप की जाती थी । नारी की कुछ ऐसी मूतिर्या प्राप्‍त हुई है जो शिशु को स्‍तनपान करा रही है । एक और मूर्ति के गर्भ से वृक्ष निकलता हुआ दिखाया गया है ।

योगी की उपासना (Worship of Yogi) मोहनजोदडो से प्रसिद्ध पशुपति मुहर (Seal of Cattle God) प्राप्‍त हुई है जिसमें योगी के चारो ओर चार पशु-भैंसा, बाघ, गेंडा व हाथी है और दो हिरण योगी के पैर के पास है। लिंग (Phallus) और योनि की उपासना के भी साक्ष्‍य मिला है ।

लिपी(Script)- सर्वाधिक प्राचीन हडप्‍पा लिपी का नमुना 1957 ई. मे प्राप्‍त हुआ। लिपि भाव चित्रात्‍मक (Sensually pictograph) हैं।

पतन के कारण

विद्वान दृष्टिकोण
व्‍हीलर इन्‍द्र के कारण
मार्शल मैके सिन्‍धु नदी के कारण
फेयर सर्विस पर्यावरण संकट (उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति में)
रंगनाथ राव लोथल के विनाश का कारण बाढ
गार्डन चाइल्‍ड आंतरिक ह्रास एवं बर्बर बाह्य आक्रमण
एम.आर.साहनी जल प्‍लावन
आरेल स्‍टीन

जलवायु परिवर्तन

Post On 2018-01-22

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