वैदिक काल (Vedic Period)

आर्य शब्‍द का शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ होता है इस सभ्‍यता का जानकारी का प्रमुख स्रोत वेद है इसीलिएा इसे वैदिक सभ्‍यता भी कहा गया है। आर्यो के मूल निवास स्‍थान के विषय मे मतभेद है। मैकस्‍मूलर ने भाषायी आधार पर आर्यो का मूल निवास स्‍थान एशिय बतलाया हैं।

 

सिन्‍धु एवं वैदिक संस्‍कृति में अंतर

वैदिक संस्‍कृति -

  1. ग्रामीण सभ्‍यता थी ।
  2. लोहे के उपकरणो की प्रधानता ।
  3. घोडा एक महत्‍वपूर्ण पशु था ।
  4. गाय को विशेष स्‍थान प्राप्‍त था ।
  5. मूर्ति पूजा के निश्चित साक्ष्‍य ।
  6. आर्य अस्‍त्र-शस्‍त्र तथा कवच जैसे उपकरण बनाना जानते थे।
  7. व्‍याघ्र का उल्‍लेख नही मिलता ।
  8. वैदिक धर्म पुरुष देवता प्रधान था।
  9. धर्म यज्ञ का महत्‍वपूर्ण स्‍थान ।
  10. लेखन कला का प्रचलन का निश्चित साक्ष्‍य नही मिलता ।
  11. आर्य प्रखर नासिका वाले थे ।
  12. भवन निर्माण मे बास एवं लडकी का प्रयोग होता था।

सिन्‍धु संस्‍कृति

  1. नगरीय सभ्‍यता थी
  2. लोहे से बने उपकरण प्राप्‍त नही हुए है।
  3. घोडे के निश्चित साक्ष्‍य नही मिले है ।
  4. मुद्राओ पर गाय का अंकन नही है ।
  5. मूर्ति पूजा प्रचलित ।
  6. रक्षा उपकरण जैसी वस्‍तुऐं प्राप्‍त नही हुए है ।
  7. मुहरो पर व्‍याघ्र एवं हाथी का अंकन ।
  8. मातृदेवी का पूजा का प्रचलन ज्‍यादा था।
  9. यज्ञ का वितरण अत्‍यन्‍त कम था ।
  10. लेखन कला से परिचित थे।
  11. सिंधु संस्‍कृति के लोग चपटी नाक वाले होते थ।
  12. भवन निर्माण मे पक्‍की ईट का प्रयोग होता था ।

बालगंगाधर तिलक ने उत्‍तरी ध्रुव, दयानंद सरस्‍वती ने तिब्‍बत तथा अविनाश दास ने सप्‍तसैधव को आर्यो का मूल निवास स्‍थान माना है ।

1400ई. पू. में एशियामाइनर में बोगजकोई में हिट्टयत राजा का एक अभिलेख मिला है जिसमें इन्‍द्र, मित्र, वरुण आदि एतिहासिक काल (Historic Period) के वैदिक देवताओ का उल्‍लेख मिला है। मध्‍य एशिया से आर्यो की एक शाखा ईरान मे जाकर बसी। वहां से एक शाखा भारत आकर शिंधु क्षेत्र मे बस गई। इसे सप्‍त्‍सैधव क्षेत्र कहा गया।

 

वैदिक युग को दो भागो मे विभाजित किया गया है

  • पूर्व वैदिक काल (Pre-Vedic Period) –(1500ई. -1000ई.) इसमे लोग मुख्‍यत: पशुपालन पर निर्भर थे। कृषि का गौण स्‍थान था। लोगो को अभी तक लोहे का ज्ञान नही था। इस काल मे ऋग्‍वेद की रचना की गई ।
  • उत्‍तर वैदिक काल (Post Vedic Period) (1000-1600ई.पू.) लोहे की जानकारी के कारण पशुपालन की जगह कृषि मुख्‍य व्‍यवसाय हो गया। इस काल मे अन्‍य तीन वेद-यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद लिख गये।

वैदिक साहित्‍य(Vedic Literature)

वेद शब्‍द संस्‍कृत की विद धातु से बना है जिसका अर्थ है-ज्ञान प्राप्‍त करना है । वेदो को अपौरुषेय कहा गया है। इन्‍हे श्रुति भी कहते है। वैदिक साहित्‍य मे चार वेदों (श्रगवेद, सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद) का उल्‍लेख हुआ है लेकिन वेदत्रयी के अंतर्गत श्रग्‍वेद, सामवेद और यजुर्वेद आते है। इन्‍हे संहिता भी कहते है।

ब्राह्मांण ग्रंथो से बिम्‍बसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान होता है ।

शतपथ ब्राह्मांण का ऐतिहासिक महत्‍व है। इसमे कुरु पंचाल राज्‍य का उल्‍लेख है।

आरण्‍यक (Jungle Books) – आरण्‍यक का संबंध बहुविधा, रहस्‍यवाद और जीवन संबंधी विषयो से है।‍ इसका पठन-पाठन वानप्रस्‍थी,मुनि और वनवासियो द्वारा वन मे किया जाता था,इसलिए इन ग्रंथो का नाम ‘आरण्‍यक’ पड गया। इन्‍हे वन पुस्‍तक भी कहते है । इसमे रहस्‍यवाद का उल्‍लेख है। सामवेद और अथर्ववेद का कोई आरण्‍यक नही है ।

उपनिषद- यह भारतीय दर्शन का मुख्‍य आधार एवं वैदिक साहित्‍य का अंतिम वर्ग है। इन्‍हे वेदांत भी कहा जाता है।

सर्वाधिक प्राचीन उपनिषद- वृहदारण्‍यक,छान्‍दोग्‍य, तैतरीय, ऐतरेय, कौषीतकि, केन, ईश(ब्रह्म सिध्‍दांत का उल्‍लेख करता है )

श्‍वेताश्‍वर उपनिषद मे परमात्‍मा को ‘रुद्र’ कहा गया है

मैत्रायणी उपनिषद मे त्रिमूर्ति और चतुर्आश्रम सिध्‍दांत का उल्‍लेख है।

‘सत्‍यमेव जयते’ मुण्‍डकोपनिषद से लिया गया है ।

वेदांग- वेदांगो की संख्‍या छ: है। वेदो को समझने में इनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका है:-

  1. शिक्षा –स्‍वर ज्ञान।
  2. छंद-छंद शास्‍त्र ।
  3. व्याकरण-व्‍याकरण ।
  4. निरुक्‍त–शब्‍द व्‍युत्‍पत्ति शास्‍त्र।
  5. ज्‍योतिष-खगोल विज्ञान।
  6. कल्‍प-यज्ञ विज्ञान।

पुराण- पुराणो को वैदिक साहित्‍य में शामिल नही करते है। इनकी संख्‍या 18 है।

सुत्र साहित्‍य – 1.कल्‍प सुत्र (एतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण )

  1. श्रोत सुत्र
  2. शुल्‍व सुत्र (भारतीय ज्‍योमिती का प्रमुख रुप
  3. धर्म सुत्र
  4. गृह्य सुत्र

उपवेद- 1. धनुर्वेद 2.शिल्‍पवेद 3.गन्‍धर्ववेद 4. आयुर्वेद

स्‍मृतिकारों ने संस्‍कारो की संख्‍या 16 बतायी है:-

  1. गर्भाधान(गर्भ धारण करना )
  2. पुंसवन(पुत्र प्राप्ति हेतू मंत्रोच्‍चारण)
  3. सीमांतोन्‍नयन (गर्भ की रक्षा करना)
  4. जातिकर्म (पिता द्वारा नवजात शिशु का स्‍पर्श )
  5. नामकरण
  6. निष्‍क्रमण ( बच्‍चे को पहली बार बाहर निकाला जाता था)
  7. अन्‍नप्राशन(छह महीने में)
  8. कर्ण छेद (कान छेदना)
  9. चूडाकर्म (तीन वर्ष की अवस्‍था में मुंडन)
  10. विद्यारम्‍भ (घरेलू विद्या)
  11. उपनयन संस्‍कार
  12. वेदारंभ (गुरु के अधीन जाना )
  13. केसन्‍या
  14. समावर्तन
  15. विवाह
  16. अंत्‍येष्टि

पंचमहायज्ञ-

  1. ब्रह्मयज्ञ
  2. देवयज्ञ
  3. पितृयज्ञ
  4. मनुष्‍य यज्ञ(अतिथि संस्‍कार)
  5. भूतयज्ञ (बलि)

हवियज्ञ:- सौत्रामणि एवं सोमयज्ञ – अग्निस्‍टोम ।

विवाह के प्रकार (मनु स्‍मृति के अनुसार )

स्‍वीकार्य विवाह

  1. ब्र‍ह्म विवाह- दहेज सहित उसी श्रेणी के पुरुष के साथ ।
  2. दैव विवाह – यज्ञकर्ता पुरोहित के साथ ।
  3. आर्ष विवाह – वधू के संरक्षक को एक गाय और एक बैल देना होता था।
  4. प्रजापत्‍य विवाह- बिना दहेज और बिना दुल्‍हन की कीमत की मांग किए विवाह।

अस्‍वीकार्य विवाह

  1. गन्‍धर्व विवाह – इच्छित नर तथा नारी का प्राय: गुप्‍त्‍ रुप से विवाह।
  2. असुर विवाह – क्रय द्वारा विवाह ।
  3. राक्षस विवाह- कन्‍या पर कब्‍जा करके विवाह ।
  4. पैशाच विवाह- कन्‍या को भगा करके विवाह जब वह अपनी चेतना में न हो (सोई हुए अवस्‍था मे ,नशे में, मानसिक विक्षिप्‍तता) ।

 उत्‍तर वैदिक काल के बाद मे पुन: नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्‍भ हुई जिसके लक्षण हम उत्‍तर वैदिक काल के अन्तिम समय मे पाते है-

  1. भूमि पर व्‍यक्तिगत अधिकार का होना प्रारम्‍भ हुआ।
  2. लौह क्रातिं के कारण कृषि एवं उद्योग के क्षेत्र मे परिर्वतन ।
  3. आर्यो का गंगा घाटी मे विस्‍तार ।
  4. राज्‍यो के शक्ति के सिद्धांत को बल मिलना ।
  5. सामाज्‍यवादी नीति का विकास होना।
  6. जनसंख्‍या दबाव

आरंम्‍भीक नगर-काम्पिल्‍य, अयोध्‍या, वैशाली, उज्‍जैनी।

उत्‍तर वैदिक काल से ही समाज मे जो क्रातिंकारी परिवर्तन हो रहे थे उसके परिणामस्‍वरुप राजनैतिक शासनतंत्र (जो कि अब निरंकुश राजतंत्र हो गया था) को अनार्य जाति स्‍वीकार नहीं कर पा रही थी । इस प्रकार उस काल मे कुछ गणतन्‍त्रतात्‍मक जनपदों का उदय हुआ।

6ठी शताब्‍दी ई.पू.मे 16महाजनपद का उल्‍लेख पाते है (बौध्‍द ग्रंथ अगुंत्‍तर निकाय में)

कौशल का शासक प्रसेनजीत था।

वत्‍स का शासक उदयन बुध्‍द के समकालीन था।

मल्‍ल प्रजातांत्रिक राज्‍य था। आगे चलकर इसका मगध में विलय हो गया।

अवन्‍ती गोदावरी नदी के तट पर स्थित है ।

अवन्‍ती का शासक प्रत्‍योध था। ये भी बुध्‍द और महावीर के समकालीन था।

   मगध का उत्‍कर्ष

आर्यो का पूर्व की ओर प्रसार और लोहे की खोज ने राजनैतिक साम्राज्‍यवाद को जन्‍म दिया जिसके फलस्‍रुपर प्रजातंत्र और राजतंत्र की स्‍थापना हुई । लोकप्रिय परिषद कमजोर हुई, निजी सम्‍पत्ति का जन्‍म हुआ। परिणामत: एक सुव्‍यवस्थित नियन्‍त्रणकारी सत्‍ता की आवश्‍यकता पडी। महाजनपदो जिनमे मगध वत्‍स कौशल अवन्ति शक्तिशाली थें, सत्‍ता को लेकर संघर्ष छिड गया। इसमें अंग और काशी जनपदो ने भी भाग लिया। सत्‍ता का केन्‍द्र बिन्‍दु मगध बना।

इस प्रकार मगध पर हर्यक, नाग, नन्‍द, मौर्य वंशो का शासन रहा।

भारत पर विदेशी आक्रमण

  1. ईरानी आक्रमण के विषय में हेरोडोटस, स्‍ट्रेबो और ऐरियन ने लिखा है। 559BC मे सायरस ने पहला आक्रमण दारा (डेरियस प्रथम ) ने 516BC में किया।
  2. फारसी मुद्रा (चादी ) सिग्‍लोई के आधार पर भारत में चांदी का प्रचलन शुरु हुआ।
  3. मौर्यकाल मे दण्‍ड के रुप मे सिर मुंडवाने की प्रथा, मंत्रियो के कक्ष के बाह‍र हमेशा अग्नि प्रज्‍वलित होने की प्रथा फारसी शासको से ली गयी।
  4. अशोक ने शिलालेख प्रणाली डेरियस प्रथम से प्रभावित होकर शुरु की ।

युनानी आक्रमण (Greek Invasion)-

  1. सिकन्‍दर मकदूनिया के राजा फिलिप का बेटा था।
  2. सिकन्‍दर ने 326ई. पू. हिन्‍दूकुश पर्वत को पार किया। वहां के शासक (तक्षशिला) आम्‍भी ने आत्‍मसमर्पण कर दिया और सिकन्‍दर का अपने राज्‍य मे स्‍वागत किया
  3. पुरु शासक (पोरस) का सिकन्‍दर वितस्‍ता (झेलम) के किनारे युध्‍द हुइा, जिसमे पोरस पराजित हुआ। इस विजय के बाद सिकन्‍दर ने व्‍यास नदी के पश्चिमी तट पर अपना सैन्‍य अभियान रोक दिया और जीते हुए क्षेत्रो को अपने सेनापति फिलीप को सौप कर वह वापस लौट गया।
  4. 323ई. पू. में बेबीलोन के निकट सिकन्‍दर की मृत्‍यू हुई ।
  5. सिकन्‍दर भारत मे 19 महिने रहा ।
  6. सिकन्‍दर नक भारत मे दो नगरो को स्‍थापित किये बूकेपाला (
  • घोडे का नाम ) 2. निकोय (विजय के उपरान्‍त )

      बौध्‍द धर्म

प्रवर्तक- गौतम बुध्‍द (सिध्‍दार्थ )

जन्‍म – 563 ई.पू.लुम्बिनी में ।

पिता- शुध्‍दोधन (कपिलवस्‍तु के क्षेत्रिय राजा)

माता- महामया

दर्शन – प्रतीत्‍य समुत्‍पाद

गृह त्‍याग - महाभिनिष्‍क्रमण

ज्ञान प्राप्ति- पीपल वृक्ष के नीचे (वोध गया मे संम्‍बोधित)

पहला उपदेश – महाधर्म चक्र प्रवर्तन (सारनाथ में )

मृत्‍यू – महापरिनिर्वाण (कुशीनगर मे )

चार आर्य सत्‍य – 1. दु:ख 2. दु:ख समुदाय 3. दु:ख निरोध 4. दु:ख निरोध के उपाय

त्रिपिटक – 1. विनयपिटक 2. अभिधम्‍मपिटक 3. सुत्‍तपिटक

सर्वाधिक उपदेश- श्रीवस्‍ती में दिये थे ।

इन्‍होने मध्‍य मार्ग पर बल दिया और अष्‍टागिक मार्ग का प्रतिपादन किया:-

  1. सम्‍यक् दृष्टि
  2. सम्‍यक् संकल्‍प
  3. सम्‍यक् वाक्
  4. सम्‍यक् कर्मान्‍त
  5. सम्‍यक् आजीव
  6. सम्‍यक् व्‍यायाम
  7. सम्‍यक् स्‍मृति
  8. सम्‍यक् समाधि
 

वर्ण व्‍यवस्‍था के जन्‍मजात होने की बजाय कर्मगत किये जाने पर जोर

त्रिरत्‍न – बुध्‍द, धम्‍म, संघ।

भावी बुध्‍द – मैत्रेय

बौध्‍द संगीति (Budhist Council)

महात्‍मा बुध्‍द ने मृतयु के समय अपना कोई उत्‍तराधिकारी नियुक्‍त नही किया था। इसलिए उनके अनुयायियो ने समय-समय पर आवश्‍यक दिशा निर्देश प्राप्‍त करने के लिए बौध्‍द सभाओ का आयोजन किया जिन्‍हे बौध्‍द संगिति कहा जाता है । ये चार प्रकार के होते है –

प्रथम. 483 BCमें सप्‍तपर्णिक गुफा राजगृह में महाकश्‍यप की अध्‍यक्षता में सुत्‍त पिटक का पाठ आनंद द्वारा, तथा विनय पिटक का पाठ उपालि द्वारा किया गया । इस समय अजातशत्रु शासक था। यह स्‍थविरो रुढिवादियो Conservative की सभा थी ।

द्वितिय. 383BC मे वैशाली मे साबाकामी की अध्‍यक्षता मे महासांधिक और थेरवादियों ने द्वितीय सभा का आयोजन करवाया । इस समय काला सोक शासक था। स्‍थविरवादियों ने पुराने नियमों को अपनाया तथा महासंधिको ने  सुधार के साथ नये नियमो का अपनाया तथा महासंधिको ने सुधार के साथ नये नियमो को अपनाया ।

तृतीय. 251BC मे पाटलिपुत्र मे मोग्‍गलिपुत्‍त तिस्‍स की अध्‍यक्षता मे तृतीय संगीती आयोजित हुई । इस समय शासक अशोक था। अभिधम्‍म पिटक की रचना इसी समय हुई ।

चौथी. प्रथम शताब्‍दी ई. पू. 78AD में कुण्‍डल वन कश्‍मीर मे वसुमित्र की  अध्‍यक्षता में चौथी संगीति आयोजित हुई। अश्‍वघोष इसका उपाध्‍यक्ष था। कनिष्‍क इस समय शासक था। तीनो पीटको पर तीन टीकाओ का संकलन, जिसे विभाषाशास्‍त्र के नाम से जाना जाता है । इसी सम्‍मेलन मे ‘महाविभाषा’ के रुप में संकलित हुआ।

सभा की कार्यवाहियों को पाली के स्‍थान पर संस्‍कृत मे किया गया । इस सभा में  बौध्‍द धर्म-हीनयान और महायान में विभाजित हुआ।

      प्रसार क्षेत्र -1. हीनयान- श्रीलंका, वर्मा, कम्‍बोडिया, लाओस, स्‍याम,। 2. महायान-मध्‍य एशिया और चीन। 3. वज्रयान-चीन,तिब्‍बत, जापान।

      बंगाल के शैव शासक शशांक ने बौध्‍द वक्ष को कटवा डाला। 

                  जैन धर्म

प्रवर्तक- महावीर स्‍वामी (वर्धमान महावीर)  

जन्‍म - 540ई.पू. (वैशाली के निकट कुण्‍डग्राम)

पिता- सिध्‍दार्थ (ज्ञातिृक कुल के वज्जि संघ के प्रमुख )

माता- त्रिशला  (वैशाली के लिच्‍छवि कुल के चेटक की बहन)

बौध्‍द धर्म के नाम - निगण्‍ठनाथ पुत्र

दर्शन - स्‍यादवाद

पंचमहाव्रत- 1. सत्‍य 2. अहिसां 3. अस्‍तेय 4. अपिरग्रह 5. ब्रम्हचर्य (महावीर स्‍वामी द्वारा जोडा गया)

            जैन संगीति

पहली- 298ई.पू. पाटिलीपुत्र में

अध्‍यक्ष- स्‍थूलभद्र (श्‍वेतामबर और दिगम्‍बर मे विभाजित )

दूसरी - 512ई.-वल्‍लभी में

अध्‍यक्ष - देवर्धिगणि

त्रिरत्‍न -

  1. सम्‍यक श्रध्‍दा - सत में विश्‍वास
  2. सम्‍यक ज्ञान -सत का ज्ञान
  3. सम्‍यक आचरण -सदाचरण

महावीर और गौतमबुध्‍द मे अन्‍तर

समानता:-

  1. दोनो के मुलभूत सिध्‍दांत उपनिषदो से संग्रहीत।
  2. दोनो वेदो के परमाधिकार को नही मानते कर्मकाण्‍ड को मुक्तिदाता नही मानते।
  3. कर्म ओर पुन:जन्‍म मे विस्‍वास ।
  4. अहिंसा पर जोर
  5. लोकभाषा को अपनाना।

असमानता:-

  1. आत्‍मा सम्‍बन्‍धी अवधारणा की भिन्‍नता-बौध्‍द धर्म आत्‍मा को नही मानता है जबकि जैन धर्म आत्‍मा में विश्‍वास करता है। यह निर्जीवो मे भी आत्‍मा मे विश्‍वास करता है।
  2. जैनधर्म-तप पर जोर, कठोर जीवन का हिमायती, बौध्‍दधर्म मध्‍यममार्ग का प्रतिपादन।
  3. जैनधर्म जातिविरोधी नहीं है। वह बौध्‍द धर्म की अपेक्षा हिन्‍दुओ से अधिक मेल-जोल वाला है ।
 

जैनधर्म के प्रमुख केन्‍द्र :- चम्‍पा, वैशाली, राजगृह, नालंदा, श्रावस्‍ती, कौशाम्‍बी।

आजीवक सम्‍प्रदाय की स्‍थापना के पूर्व मक्‍खलि पुत्र गोशाल छह वर्ष तक महावीर स्‍वामी से उसके मतभेद हो गये।

महावीर स्‍वामी ने राजगृह‍ में मेघकुमार को, कुण्‍डग्राम में देवानेदा ब्राम्हाणी एवं ऋषभद्र को, कौशाम्‍बी में उदायिन(राजा शतानिक का पुत्र),अपनी पुत्री प्रियदर्शना एवं जमालि को दीक्षित किया।

अजातशत्रु, उदयन, चन्‍द्रगुप्‍त, सम्‍प्रति आदि जैन धर्म के समर्थक शासक थे। महावीर जी अक्‍सर बिम्बिसार एवं अजातशत्रु के दरबार मे जाते थे।

                  प्रमुख दर्शन एवं उनके प्रवर्तक

संख्‍या(गीता मे वर्णित ) -कपिल

न्‍याय(ज्ञान के चार स्रोत हैं) - गौतम

पूर्व मीमासां (वेद परम सत्‍य है) - जैमिनी

वैशोषिक (परमाणु वाद )-उलूक या कणाद

योग ( अष्‍टांग योग) - पतंजलि

लोकायत/चार्वाक - चार्वाक

उत्‍तर मीमांसा - बादरायण

आजीवक - मक्‍खलि गोशाल

                        मौर्य वंश(323-184)

चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य -   322-298

बिन्‍दुसार -        298-273

अशोक -          273-232

बृह्द्रथ -          अंतिम शासक

अशोक (273ई.पू.-232ई.पू.) - अभिलेखो में अशोक को ‘देवनामप्रियदर्शी’ (मास्‍की शिलालेख ) तथा गुर्जरा स्‍तम्‍भलेख मे ‘अशोक’ कहा गया है पुराणो मे ‘अशोक वर्धन’ तथा लघुशिलालेख मे ‘बुध्‍दशाक्‍य’ कहा गया है । अशोक की माता सुभद्रागी तथा रानियां महादेवी, असंघमित्रा तथा करुवाकी थी । राज्‍यभिषेक के सातवे वर्ष मे अशोक ने कश्‍मीर ओर खोतान को जीता । कल्‍हण के अनुसार उसने श्रीनगर नामक नगर की स्‍थापना भी की । आठवे वर्ष मे (261B.C.) अशोक ने कलिंग के शासक नंदराज को पराजित किया, इसका उललेख तेरहवे शिलालेख मे मिलता है। ह्वेनसांग के अनुसार अशोक ने उपगुप्‍त नामक भिक्षु (Saint) से बौध्‍द धर्म की दीक्षा ली थी । राज‍तरंगिणी के अनुसार अशोक शिव भक्‍त थे जबकि महावंश अनुसार आजीवक सम्‍प्रदाय के मौगलि पुत्र तिस्‍स से अशोक प्रभावित था। भाब्रु शिलालेख के अनुसार अशोक ने बौध्‍द, संघ और धर्म पर विश्‍वास किया था। सारनाथ, साची और  लघुस्‍तम्‍भो मे अशोक ने अपने आपको धम्‍म रक्षक के रुप मे प्रस्‍तुत किया दुसरे ओर सातवे स्‍तम्‍भ लेख मे अशोक ने धम्‍म की व्‍याख्‍या की है। अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने चौरासी हजार स्‍तूपो का निर्माण कराया । अपने शासन के चौदहवे वर्ष मे कनक मुनि के स्‍तूप को दुगना करवाया । अशोक ने लुम्बिनी, कपिलवस्‍तु, सारनाथ, श्रावस्‍ती, बौध्‍द गया एवं कुशीनगर की यात्रा की । तिब्‍बती जनश्रूति, के अनुसार अशोक ने अपनी पुत्री संघमित्रा तथा पुत्र महेन्‍द्र को बौध्‍द धर्म का प्रचार करने श्रीलंका भेजा। सांची का स्‍तूप अशोक ने ही निर्मीत कराया।

                  अभिलेख    

अशोक के शासनकाल की जानकारी इसके समय के लगभग 40 अभिलेखो से प्राप्‍त होती है । अभिलेखो को भारत में पढे जा सकने योग्‍य लेखन कला का प्राचीनतम प्रमाण माना गया हैं।

1750 मे टीफैन्‍थलर ने दिल्‍ली मे अशोक के स्‍तम्‍भ (Pillar rock edict) का पता लगाया था । यह फिरोज तुगलक के शासनकाल में मेरठ के पास मिला था और उसी समय इसे पढने के लिए दिल्‍ली मंगवा लिया था परन्‍तु यह पढा नही जा सका था। जेम्‍स प्रिंसेप ने इस स्‍तंभ की लिपि को 1837में पढा। खरोष्‍ठी लिपि का शिलालेख पढने वाला पहला व्‍यक्ति नोरोस था। अशोक के मास्‍की शिलालेख की खोज बीडन ने की थी। अशोक के शिलालेख ब्राम्‍ही, खरोष्‍ठी (शाहबाजगडी और मानसेरा), आरमाइक (तक्षशिला और जलालाबाद )और युनानी एवं आर्माइक (शर-ए-कुन्‍ह-कन्‍धार के पास ) लिपि में पाये गये है। अशोक ने ईरानी शासक डेरियस प्रथम (दारा) से प्रभावित होकर अभिलेख प्रथा शुरु की । ज्‍यादातर अभिलेख सफेद बलुआ पत्‍थर के है ।

अभिलेख तीन वर्गो मे विभाजित है-

दिर्घशिलालेख (साम्राज्‍य की सीमाओ पर)- कुल 14शिलालेख पाये गये है, जो 8स्‍थानो से प्राप्‍त हुये है। ये स्‍थान निम्‍न है-

 
  1. गिरनार(ब्राह्मी)।
  2. शहबाजगढी (खरोष्‍ठी )।
  3. मनसेरा (खरोष्‍ठी )।
  4. धौली (ब्राह्मी)।
  5. कालसी (ब्राह्मी।
  6. जौगढ (बाह्मी)।
  7. सोपोरा (बाह्मी)।
  8. ऐरगुड्डी (बाह्मी)।

लघु शिलालेख :- (स्रामाज्‍य के दक्षित तथा मध्‍य में )

इनके माध्‍यम से अशोक के व्‍यक्तित्‍व जीवन की जानकारी प्राप्‍त होती है । लघु शिलालेख निम्‍नलिखित स्‍थानो से प्राप्‍त होते हे -

जगह(स्‍थान ) राज्‍य (वर्तमान)

  1. ऐहरोरा      मिर्जापुर ,उत्‍तर प्रदेश
  2. भाभरु      (भाब्रु) (जयपुर,राजस्‍थान )
  3. गुर्जरा      (दतिया,मध्‍य प्रदेश)
  4. मास्‍की      (रायचूर आन्ध्र प्रदेश )
  5. ब्रह्मगिरी     (मैसुर,कर्नाटक )
  6. रुपनाथ     (जबलपुर,मध्‍य प्रदेश)
  7. शुननाती     (सन्‍नताई )(शुन्‍नाटी,कर्नाटक )
  8. सिद्धपुर     (गोबीमठ, कर्नाटक )
  9. एर्रगुडी    (कुर्नूल, कर्नाटक )
  10. जटिंग रामेश्‍वर    (कर्नाटक)
  11. गोविमठ    (कर्नाटक)
  12. राजूल मण्डिगिर    (आंध्र प्रदेश)
  13. सहसराम    (बिहार) ।
  14. पालकि गुण्‍डू    (कर्नाटक )

स्‍तम्‍भ लेखो:-

इनकी संख्‍या 7 है जो कि 6 स्‍थानो से मिले है

प्रयोग स्‍तम्‍भ लेख- कौशाम्‍बी से अकबर ने इसे उखडवा कर इलाहाबाद के किले मे लगवाया।अशोक की दुसरी पत्नि कारुवाकी तथा उसके पुत्र तीवर का नाम यहीं उल्लिखित है।

दिल्‍ली (टोपरा) स्‍तंभ लेख - फिरोज तुगलक टोपरा से दिल्‍ली लाया।

दिल्‍ली (मेरठ) स्‍तंभ लेख - फिरोज तुगलक मेरठ से दिल्ली आया ।

रामपुर्वा, लोरियाअरराज और लोरियानन्‍दगढ (बिहार)

रुमनदेई (इसके अनुसार भूराजस्‍व घटाकर 1/8कर दिया-लुम्बिनी (कपिलवस्‍तु)।

लघु स्‍तंभ लेख - सारनाथ,सांची तथा कौशाम्‍बी से तीन लघु स्‍तम्‍भ लेख प्राप्‍त हुए है।

गुफा लेख- गया के पास बिहार मे बारबरा की पहाहडयों मे तीन गुफा लेख मिले हैं। इनमे इन गुफाओ को अशोक द्वारा आजीवक सम्‍प्रदाय के भिक्षुओ को दान में दिये जाने की जानकारी है ।

अशोक के लघु शिलालेखो में सामान्‍यत: वे राजाज्ञाएं है जिनसे अशोक के द्वारा बौध्‍द धर्म स्‍वीकार करने की जानकारी मिलती है ।

वृहत शिलालेखेा तथा स्‍तंभलेखो में शासन सम्‍बन्‍धी उद्घोषणाएं है जिनमें धम्‍म सम्‍बन्‍धी नीति का उल्‍लेख किया गया है ।

शिलालेखो को नगरो के निकट या व्‍यापारिक या धार्मिक यात्रा वाले भागो के निकट स्‍थापित किया गया था।  स्‍तंभ लेखो को महत्‍वपूर्ण घटनाओ के उल्‍लेख के रुप में स्‍थापित किया गया था।

अशोक का धर्म तथा धम्‍म-

अशोक का धर्म बौध्‍द धर्म था लेकिन उसका धम्‍म उसकी नैतिक शिक्षाये थी जो उसने जनता जनता के कल्‍याण के लिये अपने शिलालेखो पर खुदवाई थी और जिन‍के पालन को सुनिश्चित कराने के लिए ही उसने धम्‍म महामात्र नियुक्‍त किये थे।

धम्‍म - 1. संगम 2. कृतज्ञता 3. दया 4. सत्‍य 5. दान 6. आदर 7. विचारों की पवित्रता 8. दृढभक्ति 9. पवित्रता 10. सेवा 11. सहायता

स्‍थापत्‍य कला

सांची व बौध्‍द गया के स्‍तूपों के अलावा सारनाथ का धमेक स्‍तूप (ईटो से बना )तथा राजगृह की जरासंधी बैठक प्रमुख है।  

















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Post On 2019-11-12