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शेरशाह सूरी - (1540-45 ई.)

फरीद को शेर खाँ का खिताब उसके संरक्षक ने एक शेर को मारने पर दिया था।

शेरशाह मारवाड़ के युद्ध में राजपूतों के सॉरी से इतनी प्रभावित हुआ कि उसने कहा-  मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए लगभग हिंदुस्तान का साम्राज्य हो चुका था। 

शेरशाह की देन 

अब्बास खाँ कहता है कि इन सरायों का यह नियम था कि इसमें जो भी दाखिल होता था,उसे सरकार की ओर से अपनी पद प्रतिष्ठा के अनुरुप सुविधाएँ,भोजन और उसके पशु के लिए चारा दिया जाता था।

अब्बास सरवानी की व्यंगपूर्ण भाषा में कहें तो कोई जर्जर बूढ़ी औरत भी अपने सिर पर सोने के गहनों से भरी टोकरी रखकर यात्रा पर निकल जाती थी तो शेरशाह द्वारा दी जाने वाली सजा के भय से कोई भी चोर-डाकू उसके पास भटकने की हिम्मत नहीं कर सकता था।

शेरशाह ने संपूर्ण साम्राज्य से उत्पादन का ⅓ भाग कर के रूप में लिया। जबकि मुल्तान से उपज का ¼ हिस्सा लगान के रूप में वसूला जाता था।